शिवपुरी। पॉलिटेक्निक में पिछले 11 सालों से प्रभारी प्राचार्य आर एस पंथ के पद पर जमे हुए आरएस पंथ के खिलाफ अनियमितताओं एवं आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन वितरण में गड़बड़ी की शिकायतों के चलते जांच टीम शिवपुरी पहुंची। इन्वेस्टिगेशन ऑफीसर प्राचार्य डॉ. भीमराव अम्बेडकर पॉलीटेक्निक ग्वालियर, शशि विकसित ने मौजूद सभी संबंधों के बयान दर्ज किए।
जांच के दौरान आउटसोर्स कर्मचारियों से भी हुई पूछताछ:-
जांच अधिकारियों के दल ने पिछले 5 सालो में संस्था में आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से जिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को रखा गया एवम् कुछ आर्थिक तंगी अथवा कम वेतन दिए जाने एवम् प्रभारी प्राचार्य के द्वारा आर्थिक शोषण के कारण छोड़कर चले गए उन सभी को बुलाया गया। चतुर्थश्रेणी कर्मचारियों में नरेश निगम, राहुल पवार, देवकिशन जाटव, सुमिरन जाटव, रिंकू जाटव, गंभीर गुर्जर, राजा यादव आदि से पूछताछ की गई।
आउटसोर्स कर्मचारी वेतन घोटाला प्रमाणित
सूत्रों ने बताया कि इन्वेस्टिगेशन के दौरान आउटसोर्स कर्मचारियों का वेतन घोटाला प्रमाणित हो गया है। कर्मचारियों की सैलरी उनके बैंक अकाउंट में ट्रांसफर नहीं की गई बल्कि दिहाड़ी मजदूरों की तरह नगद दी गई। जबकि शासन द्वारा एजेंसी को नियमानुसार फंड ट्रांसफर किया गया। इस फंड में कर्मचारियों के वेतन के अलावा प्रोविडेंट फंड और स्वास्थ्य बीमा की रकम भी शामिल थी। जबकि कर्मचारियों का ना तो प्रोविडेंट फंड अकाउंट ओपन किया गया और ना ही उनका स्वास्थ्य बीमा किया गया। आउट सोर्स एजेंसी द्वारा समाचार लिखे जाने तक इन्वेस्टिगेशन टीम के सामने ऐसा कोई डॉक्यूमेंट पेश नहीं किया था जिससे प्रमाणित होता होगी उसने कर्मचारियों को वेतन प्रदान किया है।
घोटाले में प्राचार्य की भूमिका संदिग्ध, पद से हटाया जा सकता है
आउटसोर्स कर्मचारियों के वेतन घोटाले में प्रभारी प्राचार्य आरएस पंथ की भूमिका संदिग्ध है। अपने बयान में कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें वेतन का वितरण प्रभारी प्राचार्य द्वारा किया जाता था जबकि नियमानुसार आउट सोर्स एजेंसी को कर्मचारियों के अकाउंट में सैलरी ट्रांसफर करना चाहिए। कर्मचारियों ने यह भी बताया कि उनकी नियुक्ति एजेंसी ने नहीं बल्कि प्रभारी प्राचार्य ने की थी। यदि कर्मचारियों के बयान पर भरोसा किया जाए तो शिवपुरी पॉलिटेक्निक के प्रभारी प्राचार्य के ऑफिस से ही आउट सोर्स एजेंसी का संचालन किया जा रहा है। क्योंकि आरएस पंथ प्राचार्य नहीं है, 11 साल से प्रभारी हैं इसलिए उन्हें हटाए जाने के लिए डिपार्टमेंट के पास पर्याप्त कारण उपलब्ध है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की ₹1000 की भी वैल्यू होती है
इस मामले में यह ध्यान रखना जरूरी है कि घोटाला भले ही करोड़ों का नहीं है लेकिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए ₹1000 की वैल्यू होती है। यह लोग अपने परिश्रम के बदले केवल कलेक्ट्रेट की मांग कर रहे हैं। बताने की जरूरत नहीं कि अस्थाई चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का शोषण किस कदर किया जाता है।
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