अतिश दीपंकर, पटना (बिहार), NIT;


कार्यक्रम की अध्यक्षता NTPC महाप्रबंधक ने किया। मंच संचालन कहलगांव SSV कॉलेज के प्रो० डा० पवन कुमार सिंह ने किया। जबकि अतिथियों का स्वागत विक्रमशिला मीडिया ग्रुप के एडमिन एवं विद्वान पत्रकार श्री पवन कुमार चौधरी जी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन श्री कुमार आशुतोष ने किया।
कार्यक्रम में विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधि ,जनप्रतिनिधि एवं भारी संख्या में लोग मौजूद थे।
इस अवसर पर डीआईजी विकास वैभव को गणपतसिंह उच्च विद्यालय के स्काउट गाइड के कैडेट्स ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। संत जोसेफ स्कूल पकड़तल्ला, गणपत सिंह उच्च विद्यालय, सरस्वती विद्या मंदिर गौशाला के छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर लोगों का मन मोह लिया।
इस अवसर पर भागलपुर के डीआईजी श्री विकास वैभव ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि :- सदियों से मौनरूप धारण किए विक्रमशिला_महाविहार के अविस्मरणीय पूर्व गौरव के पुनः स्थापन एवं संबद्ध ऐतिहासिक क्षेत्र के चतुर्दिक बौद्धिक एवं भौतिक विकास हेतु निस्वार्थ भाव से दृढ़ संकल्पित प्रबुद्धजनों के समूह “विक्रमशिला मीडिया ग्रुप” के वेब पोर्टल https://ift.tt/2LzPOuH के उद्धाटन कार्यक्रम में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला । आयोजित सभा में संबोधन के क्रम में ऐतिहासिक विषयों की चर्चा के पूर्व विक्रमशिला के महत्व को समझाने हेतु मैंने ‘भा’ तथा ‘रत’ के अद्भुत संयोग से निर्मित अपने राष्ट्र “भारत” के आध्यात्मिक तात्पर्य पर चिंतन हेतु सभी को प्रेरित किया चूंकि संस्कृत में ‘भा’ ज्ञान अथवा प्रकाश का द्योतक है तथा ‘रत’ का संबंध उसमें लीन होने से है । अतः ज्ञान पुंजों की प्राप्ति हेतु समर्पित हमारे राष्ट्र में अति प्राचीन काल से ही विद्या ग्रहण के विशाल केन्द्रों की स्थापना होने लगी जिसमें समस्त विश्व के सर्वप्रथम विश्वविद्यालय की स्थापना जहां पश्चिमी भारत के तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान) में हुई, वहीं कालांतर में पूर्वी भारत में नालंदा, ओदंतपुरी, सोमपुर तथा विक्रमशिला जैसे विशाल महाविहार स्थापित हुए ।
विक्रमशिला के इतिहास की चर्चा के क्रम में सर्वप्रथम मैंने पाल नरेश धर्मपाल (783-820 AD) का स्मरण कराया जिनके द्वारा गंगा से सटे पहाड़ी क्षेत्र में महाविहार की स्थापना की गई थी । मैंने सभी को उस काल में विश्वविद्यालय के समृद्धशाली रहे स्वरूप के विषय में चिंतन करने हेतु प्रेरित किया जब मुख्य परिसर में प्रविष्ट होने हेतु वर्तमान की भांति टिकटों की नहीं अपितु द्वारपालों द्वारा ज्ञान स्तर जानने के लिए किए जाने वाले परीक्षणों में सफल होना होता था । तब पूर्णतः सुसज्जित विशाल स्तूप के चारों ओर भ्रमण करते बौद्ध भिक्षुओं द्वारा अपनी प्रार्थनाएं नित्य समर्पित की जाती होंगी तथा सुदूर क्षेत्रों एवं राष्ट्रों से पहुंचने वाले एवं निवास करने वाले विद्वानों के बीच नित्यरूपी ज्ञान सभाओं का आयोजन नित्य किया जाता रहा होगा । तिब्बती धर्मगुरु लामा तारानाथ (1575-1634 AD) ने “भारत में बौद्ध धर्म के इतिहास” नामक अपने ग्रंथ में विक्रमशिला के महत्व को अनेक स्थानों पर दर्शाया है जिसमें यहां के विशिष्ट आचार्यों की गतिविधियों की भी चर्चा की है । तारानाथ के ऐतिहासिक विवरणों में धर्मपाल के समय महाविहार परिसर में एक निर्मित घेरे के अंतर्गत कुल 108 मंदिर भवनों में 108 आचार्यों तथा 6 विशिष्ट आचार्यों द्वारा 1000 शिष्यों के साथ अध्ययन एवं अध्यापन की बात प्रकाश में आती है । जब समय समय पर भव्य रूप से आयोजित होने वाले 10,000 से अधिक बौद्ध चिंतकों के सम्मेलन की मन कल्पना करता है तब पूर्व महत्व की अनुभूति सहज होती है ।
विश्वविद्यालय के आचार्य अतिश दीपंकर तिब्बत नरेश के आग्रह पर वहां गए थे तथा उनकी शिक्षाओं से ही वहां लामा धर्म की स्थापना हुई जो आज भी जीवंत है । अतः सभी तिब्बती रचनाकारों ने विक्रमशिला के संदर्भ में सदैव आदरसूचक टिप्पणियाँ की हैं तथा अनेकों ने विक्रमशिला में ही अध्ययन को अपने ज्ञान का श्रोत बताया है । तिब्बत के अलावा श्री लंका एवं अन्य राष्ट्रों से भी विद्यार्थियों के आगमन तथा प्रस्थान का क्रम चलता रहता था जिसमें अनेक विदेशियों द्वारा विश्वविद्यालय के आचार्य के पदों को भी सुशोभित करने के प्रमाण मिलते हैं । 12वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अपने आत्मरक्षण में असमर्थ ज्ञानी बौद्ध साधकों का सामना अचानक निर्मम विदेशी आक्रांताओं से हुआ और जीवन के अंतिम पलों में उनमें से अनेकों ने संभवतः मृत्यु के पूर्व ही अपने समय के ज्ञान के श्रेष्ठ प्रतीक एवं अत्यंत आराध्य स्थल को नष्ट होते तथा प्रज्वलित अग्नि में समाहित होते हुए देखा होगा ।
विध्वंस के पश्चात अनेक शताब्दियों तक विक्रमशिला के भग्नावशेष वीरान मौन में समाहित होकर कालखंड में उत्खनन से प्रकाशमान होने तक विस्मृत एवं विलीन होते चले गए । धीरे-धीरे क्षेत्र के लोग विश्वविद्यालय का नाम भी भूल गए और 1810 में फ्रांसिस बुकानन के आगमन के समय “धरोहर” के नाम से ही भग्नावशेष प्रचलित थे । 1931 में बुकानन के संस्मरणों पर टिप्पणी के क्रम में अंग्रेज लेखक ओल्डहैम द्वारा धरोहर में ही विक्रमशिला के भग्नावशेषों के मिलने की संभावना व्यक्त किया गया । तत्पश्चात स्वतंत्रता के पश्चात 1960 से 1969 तक पटना विश्वविद्यालय के प्राचीन इतिहास विभाग द्वारा उत्खनन का कार्य प्रारंभ किया गया जिससे विक्रमशिला के भग्नावशेषों के मिलने के प्रमाण स्पष्ट होते गए और फिर 1971 से 1981 तक व्यापक स्तर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा भग्नावशेषों का उत्खनन किया गया ।
अंतराष्ट्रीय स्वरूप के साथ उस काल में वैश्विक स्तर पर प्राप्त महत्व एवं प्रसिद्धि से प्रभावित #यात्री_मन जब 1200 AD के आसपास इस प्राचीन केन्द्र के निर्मम विनष्टिकरण का स्मरण कर मौन भग्नावशेषों का दर्शन करता है तब अजीब सी पीड़ा अनुभव करते हुए पूर्व गौरव के पुनः स्थापन हेतु लालायित हो उठता है । ऐसे में सार्थक योगदान समर्पित करना अत्यंत आवश्यक है । वेब पोर्टल बनाए जाने में भी यही भाव निहित है । आशा है कि पोर्टल के माध्यम से इस प्राचीन ज्ञान केन्द्र के विषय में जागरूकता अवश्य फैलेगी जो राष्ट्रभक्तों को प्रेरित करने के साथ पर्यटकों को भी आकर्षित करेगी । सभी को इस अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं।
जय हिंद !
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