कंप्यूटर में डेवलपर्स (इंजीनियर) किसी भी सॉफ्टवेयर/ प्रोग्राम को बनाने के लिए अपनी सुविधा के अनुसार हाई लेवल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज (c, c++, java इत्यादि) का उपयोग करते हैं। जबकि कंप्यूटर को हाई लेवल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज समझ में ही नहीं आती। कंप्यूटर को लो लेवल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज (जिसे बायनरी लैंग्वेज भी कहते हैं) ही समझ में आती है।
इसलिए कंपाइलर हाई लेवल प्रोग्रामिंग लैंग्वेज को बायनरी लैंग्वेज में बदलकर कंप्यूटर को यह समझा देता है कि डेवलपर भैया क्या चाहते हैं और कंप्यूटर बाबा बड़ी आसानी से उनके आदेश का पालन कर देता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे आपका मोबाइल फोन तरंगों को पकड़कर उन्हें ऑडियो में बदल देता है और जब आप बोलते हैं तो आपका मोबाइल आपके ऑडियो को इलेक्ट्रॉनिक तरंगों में बदल कर मोबाइल टावर के माध्यम से उस व्यक्ति तक पहुंचा देता है जिससे आप बात कर रहे होते हैं।
कंपाइलर हार्डवेयर है या सॉफ्टवेयर
ज्यादातर लोगों को लगता है कि कंपाइलर एक हार्डवेयर है। बिलकुल वैसा ही जैसा कि मोबाइल फोन या फिर DTH का Set-Top-Box लेकिन मजेदार बात यह है कि कंपाइलर कोई हार्डवेयर नहीं बल्कि एक प्रोग्राम है। जैसे कि केंद्रीय सरकारी प्रक्रियाओं में विदेशी भाषाओं को स्थानीय भाषा में समझाने वाला ट्रांसलेटर इंसान होता है।
कंपाइलर नहीं होता तो क्या होता है
सरल शब्दों में बात करें तो यदि कंपाइलर नहीं होता तो बिल गेट्स दुनिया के सबसे अमीर आदमी नहीं बनते हैं क्योंकि कंपाइलर यह है जो कंप्यूटर की काली स्क्रीन पर ऑडियो वीडियो और पिक्चर दिखाता है। लोग कहते हैं कि दुनिया में जब विंडोज नहीं था तब कंप्यूटर ब्लैक एंड वाइट होते थे, दरअसल दुनिया में जब कंपाइलर नहीं था तब कंप्यूटर ब्लैक एंड वाइट होते थे।
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