श्याम चोरसिया। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के संगम क्षेत्र में 5 गांव ऐसे हैं जहां पिछले 2 साल से कोई मृत्यु नहीं हुई। कोरोनावायरस के कारण देशभर में अकाल मृत्यु के समाचार आते रहे परंतु इन 5 गांव में किसी को बुखार तक नहीं आया। यहां के लोग इसे मंगलू भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।
ना पेड़ों की छांव है ना सरकार की
मध्य प्रदेश के जिला अलीराजपुर के जलसंघी, खोद अम्बा, चिकलदा और महाराष्ट के जिला नंदुबार के चिताखेड़ी, रोशागिर में पिछले 02 साल से एक भी मौत नही हुई। न किसी को बुखार आया। न सक्रमण के केतू की छाया पड़ी। ये पांचों गांव मप्र, महाराष्ट, गुजरात के संगम केंद्र की शान है। सैकड़ों गांवो की तरह ये गांव भी सरदार सरोवर में समा गए या किनारे आ लगे। अब यहाँ जल संकट नही है। इलाका पहाड़ी, पठारी है। हर पहाड़ वृक्ष विहीन है। इस पहाड़ी क्षेत्र में जिस प्रकार वृक्ष नहीं है उसी प्रकार सरकारी सुविधाएं भी नहीं है।
कोरोनावायरस कि दोनों लहरों में एक भी ग्रामीण संक्रमित नहीं हुआ
कोरोनावायरस महामारी की पहली और दूसरी लहर के दौरान इन पांचों गांव में वायरस प्रवेश तक नहीं कर पाया। यहां रहने वाले ज्यादातर आदिवासियों का जीवन काफी कठिन है। उन्हें रोज पहाड़ चढ़ना और उतरना पड़ता है। नर्मदा नदी में डरते हैं। नाव चलाते हैं। मछलियां पकड़ते हैं और मोटा अनाज खाते हैं। पहाड़ पर आदिवासी हैं इसलिए जड़ी बूटियां इनके जीवन का अंग बन गई है।
कठिनाइयों में जिंदगी के रास्ते निकाल लिए
यहां सदियों से सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया जाता है। सबके घरों के बीच में पर्याप्त दूरी है। कुल 53 फलियों में करीब 400 झोपड़ियों में 02 हजार आदिवासी निवास करते हैं। खेती करते हैं। सुलभ सड़क मार्ग नहीं होने के कारण अपनी जरूरतों को कम कर लिया है इसलिए गांव के बाहर जाने की नौबत कम आती है। कुछ लोग रोजगार की तलाश में महाराष्ट्र और गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करने चले गए थे लेकिन महामारी के शुरू होते ही वापस लौट आए। अब वह लोग अपने गांव को छोड़कर जाना ही नहीं चाहते।
ना आंगनवाड़ी, ना स्वास्थ्य केंद्र, सिर्फ एक स्कूल है
इन पांचों गांव में स्कूल तो है। मगर आशा और आंगनवाड़ी नहीं है। न अस्पताल न नर्स।डॉक्टर तो बड़ी बात है। एडीएम एससी वर्मा के अनुसार बैक वाटर कम होने पर पचासों टापू उभर आते हैं। मगर 98% चिराग विहीन ही है। सितंबर में लोग टापुओं पर से फिर हट जाते है।
60 किलोमीटर की दूरी 5 घंटे में तय होती है
इन पठारी, पहाड़ी गांवो तक पहुंचना सहज नही है। अलीराज से 60km की दूरी तय करने में 05 घण्टे लगते है। उतार, चढ़ाव, घुमाव, खाई, खोह, पतले रास्ते। ककराना फिर भी 05 km रह जाता है। ये दूरी पैदल ही तय करना पड़ता है।
अब तो सरकारी सहायता की मांग भी नहीं करते
दिलचस्प बात है कि आदिवासियों ने परिस्थितियों के साथ न केवल समझौता कर लिया है बल्कि इस जीवन में उन्हें सुख और आनंद की प्राप्ति होने लगी। अब तो यह लोग सरकारी योजनाओं के लिए आवेदन निवेदन तक नहीं करते। गांव में एक वैध है। जब वह मना कर देते हैं तो गुजरात के छोटा उदयपुर के अस्पताल जाकर इलाज करवा लेते हैं।
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