कल फिर दशहरा आ रहा है | दशहरा शौर्य, शक्ति और विचार का पर्व है, इसके एक दिन पूर्व देश पर विचार जरूरी है, देश आज अजीब से दौर से गुजर रहा है | केंद्र और राज्य सरकारें अपनी-अपनी तरह से चल रही है | भारत का संघीय ढांचा चरमराता दिख रहा है | भारी बहुमत से एकांगी संसद और क्षीण समर्थन के कारण निस्तेज प्रतिपक्ष से विश्व का सबसे प्रजातंत्र अपने उद्देश्य से भटकता सा दिख रहा है | प्रतिपक्ष की नजर से अब सब गलत हो रहा है और सत्तापक्ष के दृष्टिकोण में पिछले 6 दशक में कुछ नहीं हुआ | जैसे जुमले रोज सुनने को मिलते है |इस सबकी व्याख्या करने वाले मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर उसे इस खाने या उस खाने में धकेलने की कोशिश हो रही है | कार्यपालिका सबसे आगे दिखने वाला चेहरा पुलिस दमन की लाठी लेकर “सरकार समर्थ” के पक्ष में है |
मीडिया का हिस्सा होने के नाते सबसे पहले मीडिया, मीडिया अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खुद को स्वतंत्र मानता है। इसके लिए हमेशा मौलिक अधिकार का जिक्र होता है जो संविधान के अनुच्छेद-19 में है। इतिहास कहता है कि 26 जनवरी, 1950 को संविधान लागू होने के कुछ महीनों बाद ही यह महसूस किया जाने लगा था कि इस अधिकार को लोग असीमित मानने लगे हैं। 1951 में खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहला संविधान संशोधन विधेयक लेकर आए, जिसमें कहा गया कि सार्वजनिक हित में मौलिक अधिकारों पर पाबंदी लगाई जा सकती है। नेहरू का कहना था कि ये बेशक सांविधानिक अधिकार हैं, लेकिन देश की सुरक्षा व सामाजिक हित के लिए एक सीमा के बाद इन अधिकारों पर पाबंदी जरूरी है। जब किसी एक का मौलिक अधिकार दूसरे व्यक्ति के अधिकार को प्रभावित करे, तो उस पर बंदिश लगनी ही चाहिए। कश्मीर के व्यापक सन्दर्भ में इस पर विचार कर सकते हैं |
मीडिया के मामले में प्रेस कौंसिल ऑफ इंडिया, न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन या सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन जैसी संस्थाएं आंतरिक तौर पर रेग्यूलेट, यानी विनियमन का काम करती हैं। मुश्किल यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मौलिक अधिकारों का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल नहीं हो रहा, जिस कारण बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत आ रही है। मगर सवाल यह है कि जिसे यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, वह एजेंसी इसके लिए कितनी तैयार है?
आम धारणा में कानून लागू करना पुलिस का दायित्व माना जाता है। इसकी बड़ी वजह यह है कि अपने यहां पुलिस सरकार का हिस्सा है, जबकि अमेरिका, जापान जैसे तमाम देशों में यह एक स्वायत्त संस्था है। इसी कारण भारत में पुलिस का सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा दिखता है। इतना ही नहीं, यहां पुलिस की जिम्मेदारी दोहरी प्रवृत्ति की है। वह नियुक्ति, तबादला, सेवा निवृत्ति जैसे कामों के लिए सरकार व राजनेताओं पर निर्भर है, जबकि कानून लागू करने के लिए वो न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह है। यह एक ऐसा मकडजाल है, जिससे भारतीय पुलिस चाहकर भी नहीं निकल पा रही। पुलिस की इसी दोहरी प्रकृति का लाभ सरकार उठाती है|
प्रजातंत्र में पुलिस के माध्यम से शासन करने का तरीका गलत है। स्थिति यह है कि आज पुलिस-प्रशासन को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं। जो आज सत्ता में है, वह विपक्ष में जाने पर वही भाषा दोहराता है, जो आज विपक्षी दल बोल रहे होते हैं। पुलिस सैद्धांतिक तौर पर कानून लागू करने वाली संस्थाही तो होती है, पर अब उसे शासकों की एजेंसी बना दिया गया है। इससे लगने गा है पुलिस आज जो कुछ भी कर रही है, सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स के इशारे पर कर रही है | आज देश अपराधी और पुलिस के गठजोड़ जैसी छबि से निकल इससे भी खतरनाक पुलिस –राजनेता गठजोड़ दिख रही है। लिहाजा, आज भारतीय समाज के सामने प्रश्न खड़ा है उसे कैसा प्रजातंत्र चाहिए | समस्या यह है इस पर कोई राजनीतिक दल बात नहीं करना चाहता उसका सारा ध्यान नीचे से उपर तक के चुनाव कैसे भी जीतने में लगा रहता है | जो इस चरमराती व्यवस्था के बारे में सोचते हैं,उनकी कोई सुनने को तैयार नहीं है| न संसद,न न्यायपालिका, न मीडिया |
प्रजातंत्र में एक जागरूक समाज ही अच्छी व्यवस्था कर सकता है। मगर दुर्भाग्य से हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है, और कार्यपालिका के साथ कुछ अंश तक न्यायपालिका भी उत्तरोत्तर शासन का हिस्सा बनती जा रही है, जिससे होने वाली गड़बड़ियां हमारे सामने हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि देश का प्रजातांत्रिक संतुलन बिगड़ता जा रहा है। यूँ तो देश का संविधान सभी से यह अपेक्षा करता है कि लोग उन कानूनों का पालन करेंगे, जो संविधान-विरोधी नहीं हैं| यह एक व्यापक विचार है, जिसमें कानून लागू करने वाली प्रक्रिया में प्रजातंत्र के सभी अंग आते हैं। आज सभी अंगों में सदुपयोग से ज्यादा दुरुपयोग दिख रहा है । सोचिये, दशहरा मुबारक हो |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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