इम्तियाज़ चिश्ती, ब्यूरो चीफ, दमोह (मप्र), NIT:

दमोह जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लाक के बमनोदा खदरीहार के वनवासियों के सामने अब जमीन से बेदख़ली का एक बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है। वर्षो से जंगल की वन भूमि पर काबिज आदिवासी वनवासी किसान सरकार की कथनी और करनी से इस क़दर आहत हो गए हैं कि एक दर्जन आदिवासी परिवार अब अपनी ही जमीन से बेदखल होने के बाद आत्मदाह की बात कर रहे हैं।

जंगलों में अपने परिवारों के साथ घास पूस की झोपड़ियों में रहने वाले और वर्षों से इसी जमीन पर खेती किसानी करके अपना और अपने बच्चों का पेट पालने वाले आदिवासी आज बेहद परेशान हैं क्योंकि जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लाक के बमनोदा ग्राम पंचायत सचिव द्वारा यहाँ निवास करने वाले सभी वनवासियों के दावा फार्म अमान्य कर दिये गए और सभी को नया कब्जा धारी घोषित कर यहाँ से बेदखल करने के आदेश वन विभाग द्वारा दिया गया है जबकि ये सभी आदिवासी समुदाय के लोग यहाँ 1993 से काबिज़ हैं जिनको कब्जा का 2003 में अर्थदण्ड भी मिला है जिसकी बाकायदा रशीद कटी है और शासन ने वन अधिकार कानून लागू किया 2008 में फिर भी एक दर्जन परिवारों को नया कब्जाधारी बताकर उनकी खड़ी फसलों को नष्ट और तबाह करके यहां से चले जाने को कहा जा रहा है। वनवासी आदिवासी वन भूमि दावा फार्म अमान्य होने के साथ ही भूमि कब्जा सत्यापन ना होने से अब इन सबके सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने बेदख़ली पर रोक लगा रखी है मामला कोर्ट में लंबित है इसके बावजूद जिला प्रशासन और वन विभाग इन गरीब आदिवासियों की जमीनों का सत्यापन नहीं कर रहा है।

इस ख़बर पर हमारे NIT संवाददाता इम्तियाज़ चिश्ती ने दमोह से 60 किलोमीटर दूर बसे ग्राम खदरीहार पहुंचकर जायजा लिया और आदिवासियों का दर्द जाना। इन लोगों का कहना है कि अगर हम लोगों को यहां से हटाया गया तो हम हटने से पहले ही हम परिवार सहित आत्मदाह कर लेंगे। अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006, 2007 और 2008 संशोधित नियम 2012 के तहत वन भूमि पर वर्षों से काबिज आदिवासी वनवासी लोगों को काबिज भूमि का अधिकार पत्र आज तक प्राप्त नहीं हुआ जबकी 2008, 2009 में आदिवासी वनवासी लोगों ने आवेदन भरकर ग्राम वनाधिकार समिति के पास जमा किये और पावती प्राप्त की थी उसके बावजूद प्रशासन की नज़र में ये सरकारी रिकॉर्ड में आज भी ये वनवासी यहां के पुराने कब्जाधारी नहीं हैं।

जब आदिमजाति कल्याण विभाग की जिला संयोजक रेखा पाँचाल से जानकारी मांगी तो उन्होंने जिला प्रशासन के पोर्टल पर इनका नाम ही अंकित न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया। इस पूरे मामले में निचले स्तर के कर्मचारियों ने जो गड़बड़ियां की हैं उसकी सजा आज इन आदिवासियों का एक एक बच्चा झेल रहा है।

इस संबंध में जब हमारे संवाददाता इम्तियाज़ चिश्ती ने जिला वन मण्डल अधिकारी विपिन कुमार पटेल से बात की तो जनाब ने अपने विभाग की नाकामियों को बड़ी खूबसूरती से छुपाते हुए मामले की जाँच कराने की बात कही। अब देखने लायक होगा कि इस ख़बर के प्रकाशित होने के बाद जिला प्रशासन और वन विभाग इन गरीबों की किस्मत का क्या फैसला करते हैं।
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