जबलपुर। नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा आर्थिक आधार पर गरीब सवर्णों को दिए गए 10% आरक्षण के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है। याचिकाकर्ता इस आरक्षण को संविधान के खिलाफ बताया है। हाई कोर्ट ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए 10% EWS आरक्षण के तहत अब तक हुई सभी भर्तियों को अपने फैसले के अधीन कर दिया है। अर्थात यह कि यदि हाईकोर्ट में 10% EWS आरक्षण के खिलाफ फैसला आया तो सभी लोगों की नौकरी चली जाएगी।
OBC वर्ग के 5 छात्रों ने दायर की याचिका
हाईकोर्ट में ये याचिका ओबीसी वर्ग के 5 छात्रों की ओर से दायर की गई है। याचिका में राज्य सरकार द्वारा 2 जुलाई 2019 से लागू किए गए ईडब्लूएस आरक्षण की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सरकार ने 10 फीसदी ईडब्लूएस आरक्षण से एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को बाहर कर दिया है जिसे संवैधानिक नहीं माना जा सकता।
'8 फीसदी आबादी को 10 फीसदी आरक्षण क्यों?'
याचिका में कहा गया है प्रदेश में एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग की आबादी 87 फीसदी है जबकि अल्पसंख्यक आबादी 5 फीसदी और सामान्य वर्ग की आबादी 8 फीसदी है। ऐसे में 8 फीसदी आबादी को 10 फीसदी ईडब्लूएस आरक्षण देने को याचिका में चुनौती दी गई है। याचिका में ये भी कहा गया है कि एससी-एसटी और ओबीसी वर्ग के गरीब लोगों को भी ईडब्लूएस आरक्षण का लाभ दिया जाए अन्यथा इसे सुप्रीम कोर्ट की गाईडलाईन के मद्देनजर खारिज कर दिया जाए। क्योंकि 10 फीसदी ईडब्लूएस आरक्षण से प्रदेश में आरक्षण की सीमा अधिकतम 50 से बढ़कर 60 फीसदी हो गई है।
नोटिस जारी कर मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने याचिका को गंभीरता से लेते हुए प्रदेश में ईडब्लूएस कोटे में हुई तमाम भर्तियों को याचिका पर अपने अंतिम फैसले के अधीन कर दिया है और मामले पर केन्द्र और राज्य सरकार सहित पिछड़ा वर्ग आयोग से जवाब मांगा है। मामले पर अगली सुनवाई 13 मार्च को की जाएगी।
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