लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में जिसे देख मन प्रसन्न और विचलित दोनों हो जाता था वह राजू भाई अब नहीं रहे, राजू भाई को श्रद्धांजलि

Edited by Arun Rai, लखनऊ (यूपी), NIT:

आज जब किसी प्रथम वर्ष और द्वितीय वर्ष के छात्रों को प्रेम के विषय पर कैम्पस में घबराते हुए और परेशान होते हुए देखता हूं। … तो एक व्यक्ति सहसा याद आ जाते हैं…।

लखनऊ विश्वविद्यालय में आए मुझे बस एक माह ही हुआ था, हास्टल पर आए प्रशांत को छोड़ने की औपचारिकता पूरा करने के क्रम में मै और अभीजीत जी गेट नंबर एक तक जा रहे थे, बारिश की निशानी बस बुंद के रूप में अशोक के पेड़ों से टपक रही थी… कभी जमीन पर कभी जमीन पे चलने वालों पर. कैफे के सामने से सुधांशु विक्रम सिंह सेब खाते हुए आ रहा था …

हम लोग पहुंचे ही थे की किसी ने हमें रोकने के लिए अवाज उछाला, पीछे मुड़ने पर एक अधेड़ उम्र का आदमी थकी आंखों के साथ हल्का मटमैला कुर्ता पहने खडा था, हमारा आश्चर्य आंख से लुढ़क कर जबान पर आ ही रहा था कि उस अधेड़ व्यक्ति ने कलम मांगा और मेरे हाथ को खींचकर उस पर Luck खरोंच दिया। फिर लगा मुझे शिव जी का भक्त बताने और साथ ही कुछ बड़बड़ाता रहा। जैसे मृत्यु और घबराहट ये सब अलफाज की गुणता हमें समझाने लगा। मुझे लगा ये कोई भिखारी या पागल होगा, मैं भी मज़ाक के मूड़ में कहने लगा क्या ये अफवाह सही है की फवाद खान मेरी तरह लगता है? वो अधेड़ व्यक्ति मुस्कान लिए मेरी बात सुनकर एक पांव हचकता चल दिया। सुधांशु का एक सेब ऐसे नुकसान हुआ की हम उससे मागं कर खा लिए। वह पागल जैसा आदमी अपने रास्ते मैं अपने रास्ते बात आइ गइ हो गई।

कुछ दिन बाद युं ही आदित्य राय को बताया उस अधेड़ व्यक्ति के बारे में और वह रहस्यमयी मुस्कान लिये बोल पड़े वो भिखारी या पागल नहीं भौतिक विज्ञान के गोल्ड मेडलीस्ट हैं और हमारे सीनियर भी। पहले तो यकीन ही नहीं हुआ पर फिर बहुत लोगों ने यही बात कहीं। फिर ये हालत क्यों किसी भौतिकी के गोल्ड मेडलीस्ट की होगी… या ये हुआ कैसे ???

आदित्य राय ने फिर बताया की कुछ लोगों का कहना है की ये प्रेम में बौखलाहट की निशानी है जो IAS बनने के बाद इन्हें भुल गई। मुझे यकीन नहीं हो रहा था मैं कैसे मान लेता प्रेम की वजह से कोई इस कदर बदल जाएगा। प्रेम बर्बादी का कारण कैसे हो सकता है?

साल बदल गया और मुझे वो सख्स कई बार और कई जगह दिखा कभी IT चौराहे पर… कभी हनुमान शेतु… कभी लाल बरादरी… कभी किसी चबुतरे पे सोए तो कभी कैंटीन के बाहर चाय पिते हुए … कई सीनियर लोग पैसा भी देते रहते थे…।

एक दिन हम आदत के मुताबिक विश्वविद्यालय का एक चक्कर लगा कर पिया मिलन पार्क से माननीय जी (तब ईकाई उपाध्यक्ष थे छात्रसभा के) और पारस के साथ आ रहे थे पाण्डेय जी के कैन्टीन पर हम चंदा ‘सिस्टम’ से ठंडा पी ही रहे थे कि वो ‘हमारे गोल्ड मेडलीस्ट सीनियर’ आ गए। माननीय जी ने उन्हें भी ठंडा पिलाने की पेशकश की और फिर मैं पूछने लगा …
“क्या आप भौतिक विज्ञान के गोल्ड मेडलीस्ट थे “???
वो बडे़ इत्मिनान से बोले “हाँ पढता था एक समय भौतिक विज्ञान फिर बहुतों को पढाया भी, एक दम हंसते हुए बोल दिये। ”
और वो कहाँ हैं आज कल… वो… जिनसे आप प्रेम करते थें…हैं… जिसने ये सब किया ??? एक दम दबे स्वर में मैंने पुछा।
वो सुनते ही बोल पड़े वो इलाहाबाद के उस गाँव की हैं जहां से 20 IAS हैं और वो भी उन में से एक हैं। माननीय जी उनको दस रुपया दिये वो परचित अंदाज में एक पांव से हिचकते हुए आगे निकल गए।

मैं अब तक सोचता हूँ की क्या प्रेम का यही वास्तविक स्वरूप है की एक अपने कामयाबी के रास्ते चला जाए और दूसरा … दूसरा कहीं भटक जाए, कहीं गुम हो जाए, बर्बाद हो जाए या कुछ और भी बुरा … नहीं ये तो प्रेम का स्वरूप नहीं है, ये प्रेम का स्वरूप नहीं तो क्या है ये … किसी भाव का ये परिणाम है।

एक और बार हमने पुछा था ऐसे ही अंत तक बुढापे में यहीं रहेंगे तो बोल रहे थे ना… कुछ दिन बाद गंगोत्री जाउंगा।

उनकी पहले की सच्चाई क्या है मै नहीं जानता था ….
पर अगर ये सच है तो लोग कहते हैं वो अधेड़ सीनियर को घर वाले ले गए थे पर फिर यहीं छोड़ गए। घर वाले ले गए और फिर कितनी अजीब और विपरीत परिस्थिति रही होगी की उनको यहीं विश्वविद्यालय लाकर छोड देना पड़ा होगा और तब से वो यहीं पर रहे कैम्पस में यही सोते घुमते रहते और टहलते हुए जब तक की पिछले साल बीमार होकर गिर न गए। अब जबकि ‘परिवार’ विश्वविद्यालय ही हो चला था प्रखर और सुधांशू ने उनका ख्याल रखा पांव के भयंकर घाव के लिए सब कुछ कराया। हास्पिटल में कुछ दिन भर्ती रहे फिर अचानक हास्पिटल छोड़कर भाग गए और 3 दिन बाद खबर मिली कि वो मर गए। अपने घर को छोड़कर आते वक्त ये ख्याल नहीं रहा होगा कि अंत कैसे होगा, लाश शायद लावारिस ही रह जाएगी ये अंदाजा रहा होगा।

(साभार नीरज पांडेय)



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