भोपाल। मध्य प्रदेश के हाल क्या होंगे जब राजधानी भोपाल बेहाल है। यहां 20 लाख से ज्यादा रजिस्टर्ड आबादी को मलेरिया-डेंगू जैसे संक्रमण से बचाने के लिए मात्र 50 स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैनात हैं जबकि 1976 यानी करीब 43 साल पहले 5 लाख की आबादी के लिए 100 से ज्यादा स्वास्थ्य कार्यकर्ता तैनात किए गए थे। सरल शब्दों में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाएं बंद कर दीं हैं जबकि यह उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी में से एक है।
1976 में योजना लागू हुई थी
वर्ष 1976 में वैक्टर बोर्न डिसीज से बचाव के लिए शहरी मलेरिया योजना लागू की गई थी। तब भोपाल की आबादी लगभग 5 लाख थी। उस समय 101 कर्मचारियों का अमला तैनात किया गया था। अब वार्डों की संख्या 85 और आबादी 20 लाख से ज्यादा हो गई है लेकिन मात्र 50 कर्मचारियों की टीम काम पर है। भोपाल को मलेरिया-डेंगू से सुरक्षा दिलाने वाले कर्मचारियाें की संख्या आधी रह गई हैं। स्वास्थ्य विभाग ने 43 सालों में एक बार भी फील्ड वर्कर के पद नहीं बढ़ाए। दूसरी तरफ विभाग में सेवानिवृत्ति के कारण रिक्त हुए पदों पर भर्ती पर भी रोक लगी हुई है। पिछले दस साल में कायालर्य के 50 कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
बागसेवनिया, अशोका गार्डन में डेंगू का प्रकोप
मलेरिया अधिकारी डॉ. अखिलेश दुबे ने बताया कि शहर के सेमरा कला, अशोका गार्डन, सुभाष नगर बागसेवनिया, बागमुगालिया डेंगू से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्र हैं। पिछले एक माह में भोपाल में कुल 125 मरीज मिले हैं। इनमें से 40 प्रतिशत मरीज इसी क्षेत्र के हैं। इसके अलावा साकेत नगर, बोर्ड कालोनी और चार इमली में भी डेंगू के मरीज मिले हैं।
माशिमं के अधिकारियों के घर में मिला लार्वा
मलेरिया कार्यालय और नगर निगम की टीम को बोर्ड कालोनी और मंडीपुरम के कई घरों में भारी मात्रा में डेंगू का लार्वा मिला। ज्यादातर घरों में कूलर और फ्लावर पॉट और गमले के नीचे रखी प्लेट में लार्वा मिला। नगर निगम के स्वस्थ्य अधिकारी राजेश सक्सेना ने बताया कि बोर्ड कालोनी एवं मंडीपुरम के छह घरों पर सौ-सौ रुपए का जुर्माना लगाया गया है। इनमें माध्यमिक शिक्षा मंडल के अधिकारी भी शामिल हैं। इन सभी घरों पर में 15 दिन पहले भी लार्वा मिला था और उस वक्त समझाइश भी दी गई थी।
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