डाॅ पायल तड़वी मामला: भारत मुक्ति मोर्चा के आंदोलन में बरसे राजू खरे, कहा दोषियों को हो फांसी

नरेंद्र इंगले, ब्यूरो चीफ, जलगांव (महाराष्ट्र), NIT:

मुंबई के नायर अस्पताल में मेडिकल मेधावी छात्रा आदिवासी समाज की बेटी डाॅ पायल तड़वी का मानसिक तथा जातिगत छल करते हुए पायल को आत्महत्या के लिए मजबुर करने वाले सभी वांछितों पर फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाकर तत्काल फांसी की सजा दी जाए, ऐसी मांग भारत मुक्ति मोर्चा के राजू खरे ने की है। संगठन के अंतर्गत राष्ट्रीय आदिवासी एकता परीषद जामनेर यूनिट की ओर से गुरुवार दोपहर निगम इमारत में डाॅ बाबासाहब आंबेडकर की प्रतिमा को माल्यार्पण करने के बाद पैदल मोर्चा निकाला गया, जिसमें संगठन के केडर्स ने मनुवादी व्यवस्था के विरोध में जमकर परिवर्तनवादी नारे लगाए। तहसील कार्यालय पहुंचे आंदोलकों से किए संबोधन में राजू खरे ने कहा कि पायल की मौत मनुवादी व्यवस्था के कारण हुई है। आदिवासी समाज की मृतक पायल को उनके सीनियर्स सहयोगियों द्वारा जाती के आधार पर प्रताड़ित करना, मानसिक छल करना जैसी बातों से यह साबित होता है कि भारत के मुलनिवासी बहुजनों को जातियों में बाटकर बनाई गयी इस व्यवस्था ने किस तरह अपनी जडें मजबूत करने के साथ ही हमारे लोगों का मजाक बनाया है। हमारी लड़ाई इसी व्यवस्था से है। इस आंदोलन के माध्यम से हमारा संगठन सरकार से यह मांग करता है कि पायल की मौत के लिए जिम्मेदार अभियुक्तों की सभी डिग्रियां खारिज की जाए और HOD पर SC/ST एक्ट के नूसार मामला दर्ज किया जाए और यह मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट मे चलाकर जल्द से जल्द निपटाया जाए। पीड़ित परिवार को सरकार 1 करोड रुपये की सहायता राशि प्रदान करे। आंदोलन के दौरान बामसेफ़, भारत मुक्ति मोर्चा और एकता परीषद के अनीस तड़वी, शौकत तड़वी, गुलाम तड़वी, मुनीर तड़वी, बशीर तड़वी, सद्दाम तड़वी, प्रल्हाद बोरसे, जावेद तड़वी समेत पदाधिकारियों ने सरकार और प्रशासन के ढुलमुल रवैय्ये के खिलाफ़ जमकर नारेबाजी की।

विदीत हो कि MD स्नातकोत्तर की छात्रा डाॅ पायल तड़वी ने अपने सीनियर्स द्वारा प्रतिदिन की जाने वाली जातीगत रैगिंग से परेशान होकर 22 मई को छात्रावास के रुम नं 806 में पंखे से झुलकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना से पुरोगामी कहे जाने वाले पूरे महाराष्ट्र में व्यवस्था के खिलाफ़ उमडा आक्रोश सड़कों पर दिखाई पडा। किसी समय दकियानूसी सोच रखने वाले जामनेर जैसे शहर में अब भारत मुक्ति मोर्चा जैसे केडर्स बेस सामाजिक संगठनो ने जनता के बीच जाकर संवैधानिक आंदोलनों और संघर्ष की परिभाषा को रेखांकित किया है और जामनेर की कथित सोच को नया आयाम देने का प्रयास किया है। इससे एक बात साफ़ हो गई है कि लोकतंत्र में किसी भी शक्ल में कभी भी कोई पूर्णविराम यानी फुल स्टाप नहीं हो सकता।



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