जाय फूल लर्निंग: जब बुद्धू राम भी चल पड़ा

Edited by Pankaj Sharma, NIT:

कहानी लेखक: ममता वैरागी

आज एक अप्रैल थी, शासन के आदेश के अनुसार फिर से शाला संचालित करना थी, सभी बच्चों को गतिविधियों के तहत हिंदी और गणित जैसे मूलभूत, विषयों को खेल खेल में कुछ सीखाना था।
शिक्षक गुणवान थे, पुरानी परिपाटी के थे, वह जानते थे कि बच्चों की नींव किस तरह पक्की करना है ताकि बच्चा चल पड़े, उन्हें पता था कि एक बार चलाकर हाथ छोड़ भी दूंगा तो बच्चे चल पडेगे।
ओर हुआ यूं।
सुरज बहुत निकम्मा ओर आलसी लडका था। उसकी पढ़ने लिखने में कोई रूचि नहीं थी, ओर नाम ही वह चाहता था कि वह शाला जाय।शिक्षक ने सभी दुर प्रचार कर दिया था कि शाला आना है। कुछ बच्चे होशियार थे ख़ुशी जाने लगे, पर सुरज कतराने लगा। गर्मी की छुट्टियों में पढना उसे अच्छा नहीं लगता था, ओर उसके माता-पिता भी कोई ध्यान नहीं दें रहै थे। तब रामलाल जी जो शिक्षक थै ने सूरज के घर जाकर सम्पक किया, ओर माता-पिता को समझाया इसपर सुरज आ तो गया, पर बैठा रहा, उसे कोई रुचि नहीं दिखाई देती थी। रामलालजी समझ तो पहले. ही गये थे, सो ,सुरज से बोले, आज तुम दाम दो, ओर सभी बच्चे छिपेगे, आज हम छुपा,छुपी का खेल खेलेंगे। तो सुरज की आंखों में चमक जाग गई। फिर सर बोले पर छुपने वाले बच्चे कहां कितने छुपे इसको भी बतलाना होगा। कमरे के भीतर कितने, मैदान में कितने पेड़ के पीछै कितने, आई बात समझ मे। सभी ने हंसते हुए हां कर दी, वही सुरज फिर सोच मे। तब रामलाल जी सर नेउसके सर पर हाथ धरकर कहा, यह सुरज बहुत तेज से, पता हे बच्चो तुम जहां कहीं भी छुपोगे, यह दोडकर तुम्हें ढूंढ भी लेगा, ओर गिनती लगाकर मुझे बता भी देगा, इतना सुनकर सुरज जैसे चमक गया, वह बोल पड़ा हां तो इसमें क्या मैं ढुंढ लुंगा ओर आपको बता भी दुंगा। और खेल शुरू हुआ। सुरज सभी को ढुंढ रहा था, पर गिनती नहीं आने के कारण कहा कितने छुपे में गडबडझाला हो रहा था। फिर मायुस हो बैठ गया, सर पास में आये तो फिर समझ गये ओर कहने लगे तुम नाम से बोलना कौन कौन कहां छुपा था। फिर मैं बताऊंगा, समझे। इसपर सुरज फिर दोडा अपने साथियों को ढुढने। अब शाला में सभी ने प्रवेश किया कक्षा में सभी बैठ गये, ओर अब सुरज की बारी थी, उसे बतलाना था, कहां कितने छुपे थे। तब सुरज अटकने लगा, तो सब बच्चै हंसने लगे, सर इसको गिनती नहीं आती, यह कैसे बतलायेगा, तब सर ने सभी बच्चों को चूप रहने के लिए कहा ओर सुरज के सर पर फिर हाथ रखते हुए बोले, देखो सुरज अभी बतायेगा, सुरज बोलो, कमरे में कौन कौन छुपे थे, सुरज ने कहा, राम, श्याम ओर मैना, अच्छा, यह कितने हैं, सुरज ने गिनती में बोला एक, दो, ओर तीन, सर शाबाश, अब आगे बताओ, मैदान में कौन कौन थे, सुरज रवि, भानू, ओर प्रकाश, चलो कितने हुए, सुरज चुप तब फिर सर ने गिनने को कहा, फिर गिनती, तीन, तब सर ने तीन इधर और तीन उधर खडाकरके, गिनने को कहा तो सुरज बोला, छ।तब सभी ने ताली बजाई, इस तरह सभी बच्चों को बारी, बारी से खडा करके गिनती सीखाई, ओर उसी में जोड ओर घटाव फिर सर बोले देखो पर्यायवाची शब्द भी अपने यहां बन रहे हे। सब बोले कैसे। सर ने कहा। तुम आसमां के सुरज को देख रहे हो, सब ने हां कही, अब देखो अपने यहां यह सुरज, यह रवि, यह भानु, हे सबने कहा हां है। तब सर बोले, एक ही नाम वाले के जब दो ओर तीन नाम से हम पुकारते हैं उसे पर्यायवाची शब्द कहते है। सब वाह सर यह तो बहुत ही अच्छा है। इस तरह आज की गतिविधियों मे। सर ने छात्रों को घटा बढा कर जोड, गिनती, ओर हिंदी के पर्यायवाची शब्द बतला दिये और बच्चै भी खुशी खुशी सीख गये।



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