इंदौर। मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सहायक प्राध्यापक भर्ती में एक और विवाद सामने आ गया है। आरोप लगाया गया है कि पिछड़ा वर्ग में आने वाली जातियों के 24 उम्मीदवारों को अनुसूचित जाति जनजाति के कोटे में पास कर दिया गया है जबकि ये जातियां मप्र अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां (संशोधन) अधिनियम 1976 में अनुसूचित से बाहर करके पिछड़ा वर्ग में डाल दी गईं थीं।
पत्रकार श्री लोकेश सोलंकी की रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर 2017 में पीएससी ने सहायक प्राध्यापक भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था। तमाम विवादों और कोर्ट केस के बाद जून 2018 में परीक्षा हो सकी। लिखित परीक्षा के आधार पर पीएससी ने अगस्त में अंतिम परिणाम और चयन सूची जारी की। कुल 2536 उम्मीदवारों को चयनित घोषित किया गया। चयनित उम्मीदवार नियुक्ति पत्र जारी नहीं होने पर बुधवार 16 जनवरी 2019 को भोपाल में विरोध प्रदर्शन करने पहुंचे थे। उम्मीदवार दावा कर रहे हैं कि उच्च शिक्षा मंत्री समेत अन्य अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उनके नियुक्ति पत्र जारी किए जा रहे हैं। इसी बीच इस चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी का नया आरोप सामने आया है।
गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन ने आरोप लगाया है कि पीएससी ने चयन सूची में अनुसूचित जनजाति के आरक्षित पदों पर ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों का चयन किया गया। गोंडवाना स्टूडेंट यूनियन ने बकायदा 24 नामों की एक सूची भी सार्वजनिक कर दी है। यूनियन की ओर से दावा किया गया है कि सितंबर में ही गड़बड़ी की शिकायत की जा चुकी थी। यूनियन की कार्यकारी जिलाध्यक्ष अश्विनी सिंह परस्ते के अनुसार 14 सितंबर को शहडोल जिला कलेक्टर को मामले में बकायदा लिखित शिकायत दी गई थी। यूनियन ने एक ज्ञापन के साथ 24 लोगों की सूची सौंपी थी। इनके नाम चयन सूची में शामिल हैं। सभी को एसटी के पदों के विरुद्ध चयनित दिखाया गया ह। जबकि ये सभी उम्मीदवार असल में ओबीसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। यह संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है।
विलोपित हुई थी जातियां
शिकायत के अनुसार मप्र अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियां (संशोधन) अधिनियम 1976 में संशोधन कर कई जातियों को अजजा से बाहर कर दिया था। इनमें केवट, ढीमर, भोई, मल्लाह, नवड़ा, तुरहा, कहार, रायकवार, कश्यप, सोंधिया, बर्मन के साथ ही बैरागी, सोनवानी, गडरिया, पाल, बघेला, गोसाई, बारिया, पवांर जैसी जातियों को ओबीसी की सूची में शामिल कर दिया गया है। ऐसे तमाम जाति वालों ने पुराने जाति प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर खुद को अनुसूचित जनजाति का बताया। खास बात यह है कि चयन प्रक्रिया में पीएससी ने बिना कोई जांच व शासन की सूची की पुष्टि किए इन्हें आरक्षण का लाभ भी दे दिया। इससे असल आदिवासियों का हक मारा जा रहा है।
25 साल बाद हुई RECRUITMENT
प्रदेश में करीब 25 वर्षों बाद सरकारी कॉलेजों में सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा हुई थी। इससे पहले 1992 में प्रदेश के कॉलेजों में इन पदों पर नियुक्ति दी गई थी। 2014 से सहायक प्राध्यापकों की भर्ती करवाने की कोशिश हो रही थी। 2014 में पहला विज्ञापन जारी किया गया। एक साल के इंतजार के बाद उसे निरस्त कर दिया गया। 2015 में फिर से विज्ञापन जारी हुआ जो एक वर्ष बाद फिर निरस्त हो गया। इसके बाद 2017 में विज्ञापन जारी कर 2018 में भर्ती प्रक्रिया की गई। इसके साथ भी विवाद जुड़े। शुरू से आखिर तक भर्ती प्रक्रिया में 19 संशोधन किए गए।
हाल ये रहा कि साक्षात्कार का चरण भी हटाकर सिर्फ लिखित परीक्षा से अंतिम चयन किया गया। आयु सीमा पर विवाद हुआ तो सरकार ने मप्र के मूल निवासियों के साथ बाहरी प्रदेश के छात्रों को भी 40 वर्ष की उम्र तक प्रक्रिया में बैठने की छूट दे दी।
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