फ़राज़ अन्सारी, बहराइच/लखनऊ, NIT;

उत्तर प्रदेश योगी सरकार की बहराइच सभाराज पुलिस ने इन दिनों आपराधिक घटनाओं और अपराधियों पर लगाम कसने का एक नायाब तरीका खोज निकाला है जहां रसूखदारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले मामले की जांच करने और फिर जांच को घण्टों या दिनों में नहीं बल्कि हफ्तों खींचा जाता है। इसी दौरान सभाराज की अपराधियों पर लगाम कसने का दम्भ भरने वाली पुलिस आरोपी के बजाये पीड़ित को ही मुजरिम की तरह ट्रीट करते हुए उस पर जबरन दबाव डालकर उसे थाने में बैठा कर उससे सुलहनामा लिखवा लेती है जिसके बाद मामले का चैप्टर बन्द कर शुरू होता है अपराध पर लगाम कसने के दावों के नया अध्याय जिसके आधार पर जिले में पुलिसिया इकबाल कायम करने और अपराध के ग्राफ को कम करने के खोखले दावों के ढिंढोरा पीटा जाता है। यह हम नहीं कह रहे हैं एक पीड़ित की आप बीती से आपको रूबरू करवा रहे हैं कि किस तरह लगभग एक महीना पहले हुए जिला चिकित्सालय के बाहर एक गोलीकांड की हमारी सराहनीय कार्य वाली मित्र पुलिस ने प्राथमिकी तक दर्ज नहीं की। जबकि घटना के बाद से पीड़ित चौकी थाने से लेकर पुलिस कप्तान और डीआईजी साहब की चौखट तक माथा टेंक चुका है। आपको यह भी जान कर आश्चर्य होगा कि पीड़ित मजूदा सत्ताधारी दल का बूथ अध्यक्ष है जिसका कहना है चुनाव के दौरान उसने पार्टी की जीत के लिये अपनी जी जान लगा दी लेकिन सत्ता में होने के बावजूद भी उस पर गोली चलाने वाले आरोपी के विरुद्ध पुलिस एफआईआर तक दर्ज नहीं कर रही बल्कि उल्टा उसे ही बन्द कर देने की धमकी देते हुए उससे कोतवाली में ही बिठा कर उससे जबरन सुलहनामा लिखवा लिया गया।
राजकुमार पांडेय ने बताया कि जांच के दौरान सीओ साहब के यहां उनका बयान भी लिया गया साथ ही उनके एक गवाह का भी बयान लिया गया। पीड़ित ने आरोप लगाते हुए बताया कि फायर झोंकने वाले आरोपी को तथा इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर को भी बयान के लिये बुलाया गया लेकिन वह लोग सीओ साहब के यहां बुलाए जाने पर भी नहीं गये इसके बावजूद भी मामले की प्राथमिकी दर्ज नहीं कि गयी। आपको बताते चलें कि बीते 11 अगस्त को यूपी पुलिस के सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर प्रकरण के सम्बंध में कोतवाली नगर पुलिस के रवैय्ये की एक खबर ट्वीट की गयी जिसपर यूपी पुलिस के आधिकारिक ट्वीटर हैंडल से उस रिप्लाई आया कि “कृपया आवश्यक वैधानिके कार्यवाही करें” चूंकि रिप्लाई यूपी पुलिस के आधिकारिक ट्वीटर हैण्डल एकाउन्ट से आया था तो इस पर डीआईजी रेंज देवीपाटन के आधिकारिक ट्वीटर एकाउन्ट से भी “सम्बन्धित मामले में कृत्य कार्यवाही से अवगत करायें” का भी एक रिप्लाई ट्वीट आ गया। दोनों ट्वीट रिप्लाई आधिकारिक ट्विटर हैण्डल से आया था इसलिये बहराइच पुलिस के अधिकारिक ट्विटर एकाउन्ट से भी “नोटेड सर” का ट्वीट आ गया। इसके बाद से हमारी बहादुर मित्र पुलिस डंट गयीं अपनी कार्यवाही को अंजाम देने में लेकिन यह कार्यवाही होगी क्या इसे पीड़ित भांप भी न सका।
पीड़ित राजकुमार बताते हैं कि आपने घर से वह प्रकरण के सम्बंध में सीओ आफिस जा रहे थे लेकिन घर के बाहर ही आरोपी उनसे मिल गया। पीड़ित राजकुमार का आरोप है कि आरोपी ने उन्हें धमकी दी कि चाहे कुछ भी कर लो मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा और उस दिन तो बच गये थे अगली बार नहीं बचोगे। जिसके बाद उन्होंने आरोपी को पकड़ लिया और उसे कानूनगो पुलिस चौकी ले गये जहां से आरोपी सहित उन्हें कोतवाली नगर ले जाया गया। पीड़ित ने कोतवाली नगर पुलिस पर गम्भीर आरोप लगाया कि मौजूदा कोतवाल सहित पुलिस चौकी इंचार्ज ने उसे धमकाया की मामले में सुलह कर लो नहीं तो उल्टा तुम्हे ही 14 दिन की रिमांड पर ले लेंगे और फिर ज़िन्दगी बर्बाद कर देंगे। पीड़ित का आरोप है कि उससे जबरन कोतवाली के अंदर ही बैठा कर सुलहनामा लिखवाया गया। पीड़ित ने बताया कि अब वह न्यायलय की शरण लेगा और दोषियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या आपराधिक मामले में पुलिस को सुलह कराने का अधिकार है। सवाल यह भी है कि जब मामला की प्राथमिकी दर्ज ही नहीं है तो जांच किस बात की चल रही है और सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब अपनी ही सरकार में एक बूथ अध्यक्ष के साथ हूई घटना की प्राथमिकी दर्ज नहीं हो रही तो आम जनता के साथ पुलिसिया रवैय्या क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।
क्या है एक आम नागरिक का अधिकार
किसी भी घटना की सूचना स्थानीय थाने पर देने के बाद हमारा कानून यह अधिकार प्रदान करता है कि पुलिस उसकी निःशुल्क प्राथमिकी दर्ज करेगी और दोषी के विरुद्ध आवश्यक वैधानिक कार्यवाही करेगी।
एफआईआर के सम्बन्ध में क्या हैं नागरिकों के अधिकार?
अगर संज्ञेय अपराध है तो थानाध्यक्ष को तुरंत प्रथम सूचना रिपोर्ट ( एफआईआर ) दर्ज करनी चाहिए। एफआईआर की एक कॉपी लेना शिकायत करने वाले का अधिकार है। साथ ही एफआईआर दर्ज करते वक्त पुलिस अधिकारी अपनी तरफ से कोई टिप्पणी नहीं लिख सकता, न ही किसी भाग को हाईलाइट कर सकता है।
संज्ञेय अपराध की स्थिति में सूचना दर्ज करने के बाद पुलिस अधिकारी को चाहिए कि वह संबंधित व्यक्ति को उस सूचना को पढ़कर सुनाए और लिखित सूचना पर उसके हस्ताक्षर कराए। हमारा कानून कहता है कि अगर आपने संज्ञेय अपराध की सूचना पुलिस को लिखित रूप से दी है, तो पुलिस को एफआईआर के साथ आपकी शिकायत की कॉपी लगाना जरूरी है। बताते चलें कि कई बार पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले ही मामले की जांच-पड़ताल शुरू कर देती है, जबकि होना यह चाहिए कि पहले एफआईआर दर्ज हो और फिर जांच-पड़ताल की जाये।
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