उपदेश अवस्थी/भोपाल। सीएम शिवराज सिंह का न्याय कई बार समझ नहीं आता। एक तरफ वो काफी संवेदनशील नजर आते हैं तो कई बार अजीब तरह की कंजूसी करते दिखाई देते हैं। मैं यहां बात सुल्तानगढ़ हादसे की कर रहा हूं। मोहना के 3 ग्रामीणों ने उस समय जान की बाजी लगाकर बाढ़ में फंसे 40 लोगों को बचाया जबकि प्रशासन, पुलिस और सेना का रेस्क्यू आॅपरेशन बंद हो चुका था। सरकार लाचार थी। सुबह का इंतजार कर रही थी और कोई आश्वस्त नहीं था कि सूरज की पहली किरण के साथ बाढ़ में फंसे 40 लोग जिंदा मिलेंगे या नहीं।
सुल्तानगढ़ जल प्रपात में आई बाढ़ में फंसे नागरिकों को बचाने के लिए सीएम शिवराज सिंह रात 3 बजे तक जागते रहे। केंद्रीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा मौके पर मौजूद थे। मप्र की कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया भी वहां थीं। अब किसी गवाह सबूत की जरूरत नहीं कि रात 10 बजे सरकारी इंतजाम बेकार हो चुके थे। सबकुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया था। बस पानी कम होेने का इंतजार किया जा रहा था।
जब सारी उम्मीदें टूट चुकीं थीं तब रात 3 बजे मोहना के 3 युवक निजाम शाह, कल्ला बाथम और रामसेवक प्रजापति आए और जिस बाढ़ के पानी में सरकार के प्रशिक्षित जवान उतरने से घबरा रहे थे, ये तीनों कूद गए। एकाध नहीं पूरे 40 लोगों को जिंदा निकालकर लाए। कोई गलती नहीं की। एक भी नागरिक हाथ से नहीं छूटा, सब स्वस्थ हैं, अपने परिवार के पास हैं। जबकि सरकार के तमाम प्रशिक्षित वेतनभोगी जांबाज अब तक उन लापता लोगों के शव भी नहीं तलाश पाए हैं जो बाढ़ में बह गए थे।
ये सरकार किसी खेल में गोल्ड मैडल लाने वाले को सरकारी नौकरी देती है। किसी आंदोलन में पुलिस से रायफलें छीनने वालों के परिजनों को नौकरी देती है तो क्या ऐसे जांबाजों का हक नहीं है कि उन्हे भी एक अदद सरकारी नौकरी मिले। सिर्फ 5 लाख रुपए का टोकन इस तरह जान जोखिम में डालने वाले काम के लिए प्रोत्साहन तो नहीं कहा जा सकता। क्या सरकार के इस रवैये के बाद कोई अन्य किसी की जान बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालेगा।
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