भोपाल। सन 1947 से पहले भारत में स्थापित अंग्रेज सरकार के खिलाफ आम जनता सड़कों पर इसलिए नहीं उतरी थी क्योंकि उसे अपनी जाति या मोहल्ले का विधायक चाहिए था बल्कि इसलिए उतरी थी क्योंकि उसे अंग्रेज सरकारों द्वारा वसूली जाने वाली लगान (टैक्स पॉलिसी) मंजूर नहीं थी। भारत में एक बार फिर सरकार द्वारा जनता से वसूले जाने वाले टैक्स पर चर्चा होना शुरू हो गई है। सेस के खिलाफ आवाज उठने लगी है। आम जनता समझने लगी है।
NDTV के एग्जीक्यूटिव एडिटर अखिलेश शर्मा ने लिखा है कि 'सभी करदाताओं को कहना चाहिए कि चाहे हमसे कोरोना टीके के दो हजा़र के बजाए चार हजा़र रुपए ले लीजिए लेकिन बजट में हमारे ऊपर टीके का सेस (उप कर) मत लगाइएगा। ये 4000 तो एक बार में जेब से निकल जाएंगे लेकिन सेस पता नहीं कब तक चलेगा और डसेगा।
भोपाल के वरिष्ठ पत्रकार प्रभु पटैरिया ने इसका समर्थन करते हुए कहा है कि 'सरकार सुने न सुने जनता को अखिलेश शर्मा जी की इस बात को सुनना ही नहीं गंभीरता से लेना चाहिए। नहीं तो इन "सेस" को हटवाने फिर कोई शाहीन बाग या सिंघु बॉर्डर बनाने की नौबत आ सकती है।
सेस क्या होता है, क्यों लगाया जाता है
कॉमर्स की लैंग्वेज में CESS को हिंदी में उपकर कहा जाता है। यानी एक ऐसा टैक्स जो विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए निर्धारित समय के लिए लगाया जाता है। इसका प्रावधान विशेष परिस्थितियों के लिए किया गया था परंतु पिछले कुछ समय से सरकारें ऐसे प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए जन का बजट में प्रावधान नहीं था, जनता पर उपकर लगा रही है। अध्ययन के बाद आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि एक बार उपकर लगाए जाने के बाद उसे खत नहीं किया जाता। जबकि सेस कभी भी एक वित्तीय वर्ष से ज्यादा के लिए नहीं होना चाहिए।
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