जबलपुर। नगर निगम जबलपुर और स्मार्ट सिटी के अधिकारी चाहते हैं कि जनता इज ऑफ लिविंग 2019 के सर्वे में उन्हें ज्यादा से ज्यादा पॉजिटिव वोट करें परंतु इन्हीं अधिकारियों का काला चेहरा हाई कोर्ट में उजागर हो गया है। जबलपुर का नगर निगम 13 साल में सीवर लाइन पर नहीं डाल पाया। अभी भी काम अधूरा है। हाईकोर्ट ने नगर निगम पर नाराजगी जताते हुए कड़ी फटकार लगाई है। यहां तक कि सीवर लाइन घोटाले की सीबीआई जांच तक की बात कर दी।
सीवर प्रोजेक्ट की जांच CBI से भी करा सकते हैं: हाई कोर्ट
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने सोमवार को सीवर लाइन मामले में बेहद सख्त रुख अपनाया। मुख्य न्यायाधीश अजय कुमार मित्तल ने ओपन कोर्ट में स्पष्ट कर दिया कि 13 साल से जबलपुर में जारी सीवर लाइन का काम अब तक अधूरा है। मैंने खुद साइड इंस्पेक्शन किया और तमाम तरह की कमियां और खामियां देखी हैं। इस निर्माण कार्य में प्रथमदृष्ट्या करोड़ों रुपए बर्बाद हो चुकने के संकेत मिले हैं। लिहाजा, यदि आवश्यकता हुई तो सीवर प्रोजेक्ट की जांच सीबीआई या सीआईडी को सौंपने से तनिक भी गुरेज नहीं किया जाएगा।
मुख्य न्यायाधीश अजय कुमार मित्तल व जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ के समक्ष जनहित याचिकाकर्ता जबलपुर के कांग्रेस नेता सौरभ नाटी शर्मा की ओर से अधिवक्ता आदित्य संघी खड़े हुए। जबकि हाई कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर जनहित याचिका बतौर की जा रही सुनवाई के सिलसिले में कोर्ट मित्र के रूप में अधिवक्ता अनूप नायर ने पक्ष रखा।
सीवर प्रोजेक्ट की डेडलाइन बताएं: हाई कोर्ट
कोर्ट ने कड़ाई बरतते हुए नगर निगम के अधिवक्ता अंशुमान सिंह को जिम्मेदारी सौंपी कि वे नगर निगम जबलपुर की ओर से सीवर लाइन प्रोजेक्ट का विस्तृत योजना प्रारूप (डीपीआर) प्रस्तुत करवाएं। अब तक क्या कार्रवाई की गई, इसके बारे में भी रिपोर्ट पेश की जाए। आगे की योजना क्या है और समयसीमा क्या तय की गई है, इस बारे में भी संपूर्ण ब्योरा प्रस्तुत किया जाए। इसके लिए 3 मार्च तक का समय दिया गया है।
सिर्फ सीवर लाइन नहीं अन्य बिन्दु भी शामिल
अधिवक्ता आदित्य संघी ने कोर्ट का ध्यान इस तरफ आकृष्ट कराया कि यह मामला महज सीवर लाइन का नहीं बल्कि वाटर हार्वेस्टिंग व फॉगिंग मशीन सहित अन्य जनसुविधाओं से भी संबंधित है। आलम यह है कि मच्छरों के आतंक से निपटने के नाम पर फॉगिंग मशीन वीवीआईपी जगहों पर ही चलाई जाती है। उसमें से भी रस्मअदायगी बतौर धुआं छोड़ा जाता है। दवा का नामोनिशान धुएं के साथ नहीं होता। इसलिए मच्छर नहीं मरते। वाटर हार्वेस्टिंग के नाम पर भी सिर्फ कागजी काम ही हुआ है न कि जमीनी ठोस काम।
2007 से 13 साल गुजर गए और काम अधर में
जनहित याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि 13 साल पहले 2007 में सीवर लाइन का काम शुरू किया गया था। करोड़ों रुपए स्वाहा हो गए, लेकिन अब तक सीवर लाइन का काम अधर में लटका है। कई जगहों पर पाइप लाइन धसक गई है। मकानों से अब तक सीवर लाइन नहीं जुड़ी। लिहाजा, उसका औचित्य प्रश्नवाचक बना हुआ है।
अब तक सिर्फ 30 फीसदी काम, 50 साल और लग जाएंगे
बहस के दौरान नगर निगम व ठेका कंपनी के कछुआ गति से काम पर कटाक्ष करते हुए कहा गया कि 13 साल में सिर्फ 30 प्रतिशत काम हुआ तो यही गति रही तो 50 साल बाद भी काम पूरा होने के आसार नजर नहीं आ रहे। कोर्ट ने सभी बिन्दुओं पर गौर करने के बाद आगे से इस मामले की सुनवाई प्रत्येक शुक्रवार को किए जाने की व्यवस्था दे दी। सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से महाधिवक्ता शशांक शेखर मौजूद रहे।
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