नई दिल्ली। रुपया लुढ़ककर 73 रुपये के पास है। विश्लेषकों काअनुमान है कि आने वाले समय में यह पचहत्तर रुपये प्रति डॉलर या उससे भी कम कीमत पर गिर सकता है | इसका अर्थ हुआ कि रुपया कमजोर है। चूंकि एक डॉलर खरीदने के लिए आपको 73 रुपये देने पड़ते हैं। यानी रुपये की कीमत कम है। 80 रुपये प्रति डॉलर का अर्थ हुआ कि रुपया इससे भी ज्यादा कमजोर है। किसी भी मुद्रा का मूल्य अंततः उस देश की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति से निर्धारित होता है।
उदहारण के लिए किसी वस्तु के उत्पादन में भारत में लागत 73 रुपये पड़ती है। उसी वस्तु का उत्पादन में अमेरिका में एक डॉलर का खर्च होता है। ऐसे में एक भारतीय रुपये का मूल्य 73 रुपये प्रति डॉलर हो जायेगा। यदि हम उस वस्तु को तिहत्तर के स्थान पर साठ रुपये में उत्पादित करने लगें तो हमारी मुद्रा का मूल्य भी 73 से बढ़कर 60 रुपये प्रति डॉलर हो जायेगा। जैसे-जैसे देश की कुशलता बढ़ती है अथवा उसकी प्रतिस्पर्धा करने की शक्ति बढ़ती है वैसे-वैसे उसकी मुद्रा ऊपर उठती है। प्रतिस्पर्धा शक्ति को निर्धारित करने में अभी तक बुनियादी संरचना का बहुत योगदान माना जाता था। अपने देश में बिजली, सड़क, टेलीफोन, हवाई अड्डे, इत्यादि की व्यवस्था लचर होने से माल के आवागमन में अथवा सूचना के आदान-प्रदान में खर्च ज्यादा आता था, जिससे हमारी उत्पादन लागत ज्यादा होती थी |
प्रतिस्पर्धा शक्ति के निर्धारित होने का बड़ा कारण संस्थाएं हैं। जैसे न्याय की संस्था, पुलिस की संस्था, एवं नौकरशाही की संस्था और इन संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचार। अपने देश में यदि हमको माल सस्ता बनाना है तो उद्यमी को त्वरित न्याय, पुलिस से संरक्षण एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति देनी होगी तब ही हमारी प्रतिस्पर्धा शक्ति बढ़ेगी और रुपये का मूल्य स्वयं उठने लगेगा। यह दीर्घकालीन परन्तु असली बात है।
वर्तमान समय में जो रुपये में गिरावट आ रही है, इसका एक प्रमुख कारण तेल के बढ़ते आयात हैं। हमारी ऊर्जा की जरूरतें बढ़ रही हैं और तदनुसार हमें तेल के आयात अधिक करने पड़ रहे हैं। इस समस्या को और गहरा बना दिया है ईरान के विवाद ने। अमेरिका ने पूरी ताकत लगा रखी है कि दुनिया के सभी देश ईरान से तेल न खरीदें। ईरान से तेल न खरीदने के कारण विश्व बाज़ार में ईरान द्वारा सप्लाई किये जाने वाले तेल की मात्रा उपलब्ध नहीं है। विश्व बाज़ार में तेल की उपलब्धता कम हुई है और तदनुसार तेल के मूल्यों में वृद्धि हो रही है। इस समस्या का हल सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देना है। जैसे मेट्रो अथवा बस से यात्री को गन्तव्य स्थान पर ले जाने में प्रति व्यक्ति तेल की खपत कम होती है। निजी कार से जाने में तेल की खपत अधिक होती है। इसलिए यदि हमें रुपये की कीमत को उठाना है तो हमें सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था में सुधार करना होगा, जिससे कि लोगों के लिए निजी कार का उपयोग करना जरूरी न रह जाए। साथ-साथ हमें मैन्यूफैक्चरिंग के स्थान पर सेवा क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। मैन्यूफैक्चरिंग में ऊर्जा की खपत ज्यादा होती है, सेवा क्षेत्र में ऊर्जा की जरूरत कम पड़ती है। सेवा क्षेत्र के आधार पर यदि हम आर्थिक विकास हासिल करेंगे तो हमें तेल के आयात कम करने होंगे। तदनुसार हमारा रुपया नहीं गिरेगा। ध्यान दें कि जब हम तेल का आयात अधिक करते हैं, उसके लिए हमें डॉलर में पेमेंट अधिक मात्रा में करना होता है। इन अधिक मात्रा में डॉलर को अर्जित करने के लिए हमें निर्यात अधिक करने पड़ते हैं। निर्यात अधिक करने के दबाव में हमें अपना माल सस्ता बेचना पड़ता है, जिसके कारण हमारा रुपया टूटता है।
रुपये के गिरने का एक और कारण हमारे द्वारा मुक्त व्यापार को अपनाना है। जैसा ऊपर बताया गया है कि हमारे न्याय, पुलिस एवं नौकरशाही की संस्थाओं के भ्रष्टाचार के कारण अपने देश में माल के उत्पादन में लागत ज्यादा आती है। ऐसे में यदि हम मुक्त व्यापार को अपनाते हैं तो दूसरे देशों से माल का आयात अधिक होता है क्योंकि वहां पर न्याय, पुलिस एवं भ्रष्टाचार की स्िथति हमारी तुलना में उत्तम है। वहां के उद्यमी को माल के उत्पादन में लागत कम आती है और वह अपने माल को हमारे देश में सस्ता बेच सकता है। ऐसे में हमारे सामने दो रास्ते खुले हैं। या तो हम अपनी न्याय, पुलिस एवं भ्रष्टाचार की व्यवस्थाओं को सुधारें अथवा हम बाहर से आने वाले माल पर आयात कर बढ़ा दें। । वर्तमान में हमारी लागत ज्यादा है, फिर भी हम अन्य के माल को मुक्त रूप से अपने देश में प्रवेश करने दे रहे हैं। जो गलत है|
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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