रहीम शेरानी/अरूण ओहारी, झाबुआ (मप्र), NIT:
झाबुआ जिले के थान्दला जनप्रतिनिधी हो या फिर आम जनता आज कल सभी उदारवादी नीति अपनाने के बजाय उग्रवादी नीति ज्यादा ही अपनाने लगे हैं जिस कारण सब्र और शुक्र से वह दूर होते जा रहे हैं। अर्थात कोई भी कार्यवाही में अब इसे सब्र नहीं होता और प्रशासन उस कार्य को उदासीन बनकर उसे शुक्रिया करने का अवसर भी नही देता। आजकल प्रशासन के नोकरशाहों के पास एक जुमला ज्यादा ही सुनने को मिलता है वह है जिले की बैठक और कार्यवाही का बोझ नतीजन सब काम कागजी धरातल पर हो जाते हैं जिनका वास्तविकता से कोई सरोकार नहीं होता।
थान्दला नगर परिषद पिछले कई समय से दुकान- दुकान ही खेल रही है। पहले पार्षद दुकानों के लिये भुख हड़ताल करते हैं तो प्रशासन तोड़ी गई दुकानों को बनाकर दे देता है तो कोई पार्षद दुकानों के लिये अनुविभागीय अधिकारी को तय सीमा में काम नहीं करने पर उग्र आंदोलन का हवाला देते हुए ज्ञापन देता हैं व तय सीमा के बाद फिर आश्वासन पर मान जाता है। यह बात और है कि यह सब विकास के नाम को बदनाम करते हुए निजी स्वार्थ के लिये ही किये गए काम थे।
जनता को मूर्ख समझ कर जनता के बीच हीरो बनने की यह प्रव्रत्ति आजकल आम हो गई है।
जनता के हित का इनसे दूर- दूर तक कोई वास्ता नहीं है
यदि होता तो जब पूरा नगर खुदा था जनता धूल के गुबार से मरी जा रही थी तब ये आंदोलन करते, जब पिपली चौराहे पर बहुप्रतीक्षित शौचालय का निर्माण कार्य पूरा करवाते जहाँ इन्हें दुकानें तो नजर आई पर शौचालय नहीं, डाकघर की दुकानों का कोई वैकल्पिक हल निकालते जहाँ जीव जंतु से पास के रहवासी अपने बच्चों को लेकर परेशान हैं। पूरी गर्मी निकल गई लेकिन इनकी पेयजल योजना ने आकार नहीं लिया जबकि जनता मटमैला पानी उपयोग कर ज्वाइंट पेन से प्रभावित हो रही है, वही पैसों का पानी पीने को मजबूर है। नगर की नालियों व सड़कों की सफाई करवाते लेकिन इनके नाक के नीचे की ही सफाई नहीं हो रही तो ये जनता की तकलीफ क्या समझेंगे। पुरानी नगर परिषद से अस्पताल चौराहे की वर्ष में चार बार मरम्मत करवाने की बजाये उसे नव निर्माण करवाते। बायपास बनाम रिंग रोड़ के चौराहे को जल्द सुंदर बनाकर जल्द ही इस रोड़ को शुरू करवाते लेकिन अभी जनप्रतिनिधियों को जनता के विकास के नाम पर आत्मविकास करना है ताकि वे एक बार फिर जनता को मोहरा बनाकर शह-मात का खेल खेल सकें। इन जनप्रतिनिधियों को समझना होगा कि जितनी जरूरी दुकानों का निर्माण है उतना ही जरूरी नगर की जनता की मूलभूत सुविधाओं पर काम करना भी है। फिल्हाल सीएमओ परिवर्तन से परिषद के हालात परिवर्तन हो जाये यह भी दिलचस्प सवाल है लेकिन हाँ जनप्रतिनिधियों से एक सवाल जरूर क्या वे एक बार जनता के दरबार में जनता के सवालों का जवाब देने को तैयार है, यदि हैं तो वे समय बतायें हम जनता का दरबार लगाएंगे।
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