वी.के.त्रिवेदी, लखीमपुर खीरी (यूपी), NIT;
कहा गया है कि-” जब जब होय धरम कै हानी, बाढै असुर अधम अभिमानी,, तब तब प्रभु धरि मनुज शरीरा, हरै क्लेश सब सज्जन पीरा”। जब इस धरती पर धर्म का विनाश होता है और अधर्म बढ़ने लगता है तब तब ईश्वर किसी न किसी स्वरूप में अवतरित होता है। ईश्वर के वैसे तो आंशिक कई अवतार माने जाते हैं लेकिन इनमें रामावतार एवं कृष्णावतार मुख्य रूप से पूर्ण अवतार माने गये हैं।आज ईश्वर के कृष्णावतार का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है क्योंकि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की रात बारह बजे ईश्वर धरती पर फैली आसुरी प्रवृत्तियों का सर्वनाश करने के फुल पावर यानी सोलह कलाओं के साथ बंदीगृह में माता देवकी के सुपुत्र बनकर आये थे।उस समय उनके माता पिता के साथ उनके नाना महाराजा उग्रसेन बंदीगृह में बंदी जीवन यापन कर थे।चारों तरफ अधर्म अन्याय अनाचार एवं कंस के अत्याचार का बोलबाला था और चारों तरफ आसुरी शक्तियां हाहाकार मचाये हुये थे।रामावतार में भगवान क्षत्रिय कुल में आये तो कृष्णावतार में ग्वाला बनकर यदुवंशी बन गये है।यह ईश्वर की महानता है कि उसने समाजिक समरसता एकता अखंडता को अक्षुण्ण बनाये रखने के उद्देश्य से विभिन्न धर्मों सम्प्रदायों वर्गों के आँगन में अवतरित होकर या जन्म लेकर किलकारियां भरी हैं। आज हम सबसे पहले अपने सभी प्रिय पाठकों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं देते हुये सभी के सपरिवार कुशलता सुख शांति के लिये भगवान नंदकिशोर श्रीकृष्ण से कामना करते हैं। ईश्वर का श्रीकृष्ण के रूप में अवतरण जिन परिस्थितियों में हुआ था उसमें एक नहीं अनेकों कारण थे और रामावतार के शेष बचे सारे उद्देश्यों को पूरा करना था इसीलिए रामावतार दस कलाओं के साथ हुआ था लेकिन कृष्णावतार सोलह कलाओं के साथ हुआ था। रामावतार जितना सौम्य मर्यादित एक नारी ब्रह्मचारी एवं समाजिक समानता वाला था तो भगवान का श्रीकृष्ण का स्वरूप उतना ही मदमस्त नटखट चंचल बहुरानियों एवं चमत्कारों वाला रहा है। इसके बावजूद उनके मुकुट में लगा मोरपंख इस बात का प्रतीक है कि वह मोर की तरह व्यभिचारी नही थे। भगवान श्रीकृष्ण की लीला तो भगवान राम की तरह पैदा होते ही शुरू हो गयी थी और उनकी लीला ही थी कि उनके धरती पर आते ही बंदीगृह के ताले स्वतः खुल गये एवं बंदीरक्षक सो गये। लीलाधारी नटखट कन्हैया की लीलाओं का दर्शन कर उनके चरण रज लेने के लिए यमुना जी को यमुना पार करते समय भयंकर रूप धारण करना पड़ा और उनकी लीला ही थी उन्हें पुत्र के रूप में पाकर नंदजी ही नही बल्कि पूरा यदुवंश निहाल हो गया था।उनके बचपन की लीलाओं का भरपूर आनंद वहाँ की गोपियों ,पशु पक्षियों, गाय माताओं और उनके बाल सखाओं ने उठाया।भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के वशीभूत होकर माखनचोर और चितचोर बन गये।भगवान श्रीकृष्ण का धर्मयुद्ध पैदा होते ही शुरू हो गया था और उनकी बाल लीलाओं में मामा कंस और उनके समर्थक असुर प्रवृत्ति के लोगों का विनाश भी शामिल है।भगवान श्रीकृष्ण के विविध स्वरूप और विविध लीलाएँ हैं जिनका वर्णन नही किया जा सकता है और धराधाम से वापस जाने से पहले अपने पुत्रों आदि का विनाश उनकी न्याय धर्म की पराकाष्ठा थी।उस समय एक कंस था जो अत्याचार अन्याय अधर्म का प्रतीक था लेकिन आज के समय में गली गली कंस घूम रहे है जो अपने माता पिता को बंदीगृह की तरह रखते है और उन्हें मारते पीटते ही नहीं हैं बल्कि जान से भी मार डाल रहे हैं।उस समय तो भगवान श्रीकृष्ण ने एक द्रोपदी का चीरहरण अपनी लीलाओं से बचा लिया था किन्तु आज गली गली चीरहरण नही बल्कि शीलहरण हो रहे हैं।जिन गायों को उन्होंने प्यार दुलार दिया था आज उन्हें काटकर उनका गोश्त देश विदेश भेजने का लायसेंस दिया जाता है। लोग गोवंशों को तिरस्कृत एवं बहिस्कृत करने लगे हैं फलस्वरूप वह इधर उधर भटक रही है और दर दर की ठोकरें खा रही हैं।आसुरी शक्तियां सिर ही नहीं उठाने लगी हैं बल्कि बल्कि चारों तरफ आसुरी गतिविधियों का बोलबाला है।आज हम भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते है कि कलियुग में बढ़ते आसुरी गतिविधियों का अंत करने के लिये वह पुनः एक बार फिर अवतरित हो।और पुनः भाईचारे की स्थापना करे।
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