नई दिल्ली। अंतत: क्षत्रीय और ब्राह्मण समाज की साझा मुहिम रंग लाती दिख रही है। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार 2019 की तैयारियों के बीच अब आर्थिक आधार पर आरक्षण का रास्ता तलाश रही है। बताया जा रहा है कि यह रास्ता जातिगत आधार पर आरक्षण के बीच से ही निकलेगा। बता दें कि पिछले 4 सालों में आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर कई आंदोलन हुए और खुफिया ऐजेंसियों की रिपोर्ट है कि भारत में पहली बार अनारक्षित वर्ग, आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग को लेकर लामबंद है। इसमें भाजपा के दिग्गज नेताओं सहित देश के प्रमुख ब्यूरोक्रेट्स भी शामिल हैं। भोपाल समाचार डॉट कॉम ने भी इस मांग के समर्थन में अभियान चला रखा है।
सूत्रों का कहना है कि ये चर्चा फिलहाल प्रारंभिक स्तर पर शुरू हुई है। आरक्षण पर कोई भी फैसला लेने से पहले बड़े स्तर पर सलाह मशविरा किया जाएगा। बता दें कि देश के कई राज्यों में आरक्षण को लेकर अलग अलग समुदायों की तरफ से मांग उठती रही है और हमेशा सरकारें या राजनीतिक दल इन मांगों को पूरा करने के नाम पर झूठे वादे करते रहे हैं। क्योंकि आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बिलकुल साफ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक, कोई भी राज्य 50 प्रतिशत से ज्यादा आरक्षण नहीं दे सकता। आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के तहत देश में अनुसूचित जाति के लिए 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 प्रतिशत, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण है।
आरक्षण को लेकर क्या कहता है संविधान?
विवाद के केंद्र में आरक्षण का मुद्दा है। संविधान में सीधे सीधे आरक्षण का तो जिक्र नहीं है, लेकिन संविधान की मूल भावना के हिसाब से ही आरक्षण की व्यवस्था है। आपको बताते हैं कि इस मुद्दे पर संविधान क्या कहता है।
संविधान के अनुच्छेद 46 के मुताबिक, समाज में शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के हित का विशेष ध्यान रखना सरकार की जिम्मेदारी है। खासकर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को अन्याय और शोषण से बचाया जाए।
क्या है भारत में आरक्षण का इतिहास?
देश में अंग्रेजों के राज से ही आरक्षण व्यवस्था की शुरुआत हुई थी। साल 1950 में एससी के लिए 15%, एसटी के लिए 7.5% आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। पहले केंद्र सरकार ने शिक्षा, नौकरी में आरक्षण लागू किया था। केंद्र के बाद राज्यों में भी आरक्षण लागू कर दिया।
आयोग ने पिछड़ों को 27% आरक्षण की सिफारिश की थी
राज्यों में जनसंख्या के हिसाब से एससी, एसटी को आरक्षण का लाभ है। आरक्षण लागू करते वक्त 10 साल में समीक्षा की बात कही गई थी। साल 1979 में मंडल आयोग का गठन किया गया। ये आयोग सामाजिक, शैक्षणिक रुप से पिछड़ों की पहचान के लिए बना था। साल 1980 में मंडल आयोग ने पिछड़ों को 27% आरक्षण की सिफारिश की। इसके बाद साल 1990 में वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिश लागू कर दी।
ओबीसी को कितना आऱक्षण मिलता है?
साल 1990 से ओबीसी को 27% आरक्षण मिलने लगा। हालांकि साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओबीसी को आरक्षण मिलता तो सही है लेकिन क्रीमी लेयर के साथ मिलना चाहिए। मतलब जो आर्थिक रूप से संपन्न हैं उनको आरक्षण न मिले। साल 1993 में एक लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले क्रीमी लेयर में माने गए। अभी आठ लाख से ऊपर सालाना आमदनी वाले ओबीसी को आरक्षण नहीं मिलता है।
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